…मजबूरी का नाम महात्मा गांधी क्यों ?

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सम्पूर्ण राष्ट्र आज बापू की 150वीं जयन्ती व भारत रत्न श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का 115 वां जन्मदिवस मना रहा है । मैं पत्रकार दीपक शर्मा “शक्ति” इन दोनों महान शख्शियतों को नमन करते हुए उनका स्मरण करता हूँ।

मुझे बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस बापू के बताए मार्ग को समस्त विश्व ने माना ,हमारे ही देश में एक वाक्य हम अक्सर
मामूली इंसान से लेकर बड़े बड़ों के मुंह से सुनते आए हैं कि ..मजबूरी का नाम महात्मा गांधी । इतनी बड़ी हस्ती के लिए यह शब्द सुनकर मेरा अंतर्मन बहुत रोता है । जो बापू त्याग जी प्रतिमूर्ति रहा हो उसके लिए यह विचार। यह बताता है कि हम कितना बदल गए हैं, नैतिक पतन की राह पर अवश्य अग्रसर है हम।

दूसरी ओर हम बात करें ईमानदारी व सादगी की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री जी की तो हम लोगों ने अपने धर्म ,कर्म व व्यवहार में कितनी ईमानदारी निभाई यह खूब दिखता है समाज में । बड़ा दुःख होता है जब देश को मार्ग दिखाने वाले आज के नेता क्या दिखा रहे हैं जनमानस को । आज की राजनीति का मतलब सिर्फ सत्तासुख का लक्ष्य रह गया है नेताओं का , मैं यह कतई नहीं कह रहा हूँ कि सब नेता ईमानदारी ,कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर रहे ,लेकिन यह कटु सत्य है ईमानदारी के मार्ग पर चलने वाले नेताओं की गिनती मुठीभर है।

हम गांधीवाद की राह की बात करें तो मैं यही कहूँगा वह गांधी का था व उनके साथ ही चला गया ,धर्म,दर्शन,आध्यात्म,जैसे दायरों में गांधी जी का नाम बहुत पहले ही बन्द हो गया था। आधुनिक भारत में महात्मा गांधी ही ऐसा व्यक्तित्व है जिनके बारे में परस्पर विरोधी बातें कही जाती हैं। जीवन में उनकी जगह मुश्किल से ही दिखती है।

गांधी जी के जीवन मूल्यों का केंद्रबिंदु सत्य रहा है व शास्त्री जी ने भी सदा सत्य का निर्वाह किया। लेकिन आज सत्य के मायने बदल गए हैं। बहरहाल जो भी स्थिति है ,मेरा आकलन यह है कि हमें इन महान विभूतियों को समझना होगा उन्हें पुनः अध्ययन करना होगा ।

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