ग्लोबल वार्मिंग का अहम कारण है प्रकृति-पर्यावरण से छेड़छाड़

0

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस अवसर पर प्रकृति और पर्यावरण से की गई छेड़छाड़ की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है कि इसके कारण समूचा विश्व ग्लोबल वार्मिंग की भीषण समस्या से जूझ रहा है। इसके चलते 2015 में पेरिस में दुनिया के 197 देशों ने वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया था।लेकिन क्या हम ईमानदारी से उस लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। उस स्थिति में जबकि वैश्विक तापमान वृद्धि 21वीं सदी में समूची दुनिया, पर्यावरण और प्राणीमात्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। इससे फिलहाल मुकाबले की उम्मीद बेमानी है। संयुक्त राष्ट्र् के शोध करने वाले समूह की चेतावनी इसका प्रमाण है। इस चेतावनी में स्पष्ट किया गया है कि दुनिया के प्रमुख जीवाश्म ईंधन उत्पादकों ने अगले 10 सालों में अत्याधिक कोयला, तेल और गैस निकालने का लक्ष्य रखा है।

इससे वैश्विक पर्यावरणीय लक्ष्य पीछे छूट जायेगा। रिपोर्ट में चीन और अमेरिका सहित दस देशों की योजनाओं की समीक्षा के बाद कहा गया है कि 2030 तक वैश्विक ईंधन उत्पादन पेरिस समझौते के लक्ष्यों से 50 से 120 फीसदी अधिक होगा। साल 2015 के वैश्विक समझौते के इतर 2030 तक दुनिया में कार्बन डाई आॅक्साइड का उत्सर्जन 30 गीगाटन होगा, जो औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक बनाये रखने में नाकाम होगा।

यदि हम संयुक्त राष्ट्र् पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन की मानें तो वर्तमान में दुनिया में उर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए कोयला, तेल और गैस के ही ज्यादा इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन से जलवायु लक्ष्यों को किसी भी कीमत पर पूरा नहीं किया जा सकता। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र् महासचिव एंतोनियो गुतारेस का कहना एकदम सही है कि-“ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य अब भी पहुंच से बाहर हैं। इस दिशा में हमें तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत है। यदि वैश्विक प्रयास तापमान को डेढ़ डिग्री तक सीमित करने में कामयाब रहे तो भी 96 करोड़ दस लाख लोगों के लिए यह खतरा बरकरार रहेगा।’’ जबकि हकीकत में हम वैश्विक तापमान वृद्धि के मामले में पेरिस सम्मेलन में लिए निर्णय के बावजूद 3 से 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।

यदि हमने कार्बन उत्सर्जन कम नहीं किया तो 2095 तक धरती का तापमान चार डिग्री तक पहुंच जायेगा। ऐसी स्थिति में समुद्र की तुलना में धरती पर बेतहाशा पड़ेगी। भीषण गर्मी, बाढ़ और सूखे की मार से जीना मुश्किल हो जायेगा। जानलेवा बीमारियों की चपेट में आकर लोग मौत के मुंह में जाने को विवश होंगे। उस दशा में क्या दुनिया रहने काबिल बची रह पायेगी ? चिंता की असली वजह यही है।

यहां निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि 18वीं शताब्दी के दौरान ही मानवीय गतिविधियों के चलते वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों का स्तर बढ़ना शुरू हुआ। आज ग्लोबल वार्मिंग की जो खतरनाक स्थिति है, वह बीते दो सौ साल के दौरान ग्रीनहाउस गैसों के स्तर में हुई बढ़ोतरी का परिणाम है। अब सवाल यह है कि यदि इस समस्या पर अंकुश लगाने में हम नाकाम रहे, तब क्या होगा। जाहिर है उस स्थिति में जल संकट बढ़ेगा, बीमारियां बढ़ेंगीं, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने से खाद्यान्न संकट गहरायेगा। ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी, समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा, नतीजन दुनिया के कई देश और समुद्र किनारे सैकड़ों की तादाद में बसे नगर-महानगर जलमग्न तो होंगे ही, तकरीब 20 लाख से ज्यादा की तादाद में प्रजातियां सदा-सदा के लिए खत्म हो जायेंगीं।

सदियों से जीवन के आधार रहे खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व कम हो जाएंगे, उनका स्वाद ही बदल जाएगा। खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाले बी-1, बी-2, बी-5 और बी-9 विटामिनों में और वे जैव रसायन जो हमें कई बीमारियों से बचाते रहे हैं, उनमें कमी आएगी। इस संबंद्ध में दुनिया के जाने-माने वैज्ञानिक पीटर बडहम्स की मानें तो 1970 के सितंबर में उनके ध्रुवीय अभियान की शुरूआत के समय अंटार्कटिक महासागर में आठ मीटर की बर्फ जमी थी। लेकिन अब वह हर दशक में 13 फीसदी की दर से पिघल रही है। आज वहां केवल 3.4 मीटर की ही परत बची है। यदि यह भी खत्म हो गई, तब क्या होगा?

स्वाभाविक है कि उत्तरी ध्रुव के तापमान में इस बढ़ोतरी से अंटार्कटिक में बर्फ बनने की रफ्तार पर बुरा असर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के चलते पहले ही यहां बर्फ कम होती जा रही है। इस बारे में प्रख्यात मौसम विज्ञानी एरिक होल्थस की मानें तो मौसम में यह बदलाव भयानक, अविश्वसनीय, दुर्लभ और बदलाव का चरम है। मौसम में असामान्य बदलाव के चलते उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम और दक्षिण-पूर्व एशिया की तकरीब 50 करोड़ से अधिक की आबादी को अकाल और तापमान में बेहद बढ़ोतरी के चलते भीषण गर्मी झेलने को विवश होना पड़ा है। चीन और भारत भी अमेरिका की तरह बीते एक दशक से बेहद गर्मी और बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं। यह जान लेना जरूरी है कि आर्कटिक की बर्फ हमें असामान्य रूप से हुए अप्रत्याशित मौसमी कुप्रभावों से बचाने का काम करती है। लेकिन ग्रीनहाउस गैसों के अत्याधिक उत्सर्जन के चलते आने वाले दिनों में गरमी के मौसम में बर्फ की सारी परतें न केवल थोड़ी बल्कि पूरी तरह पिघल जायेंगी। यह स्थिति समूची दुनिया के लिए तबाही का कारण होगी।

इसके बावजूद हालात की भयावहता की ओर किसी का ध्यान नहीं है। यह कि यदि धरती का तापमान वर्तमान से दो गुना और बढ़ गया तो धरती का एक चैथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा। दुनिया का 20 से 30 फीसदी हिस्सा सूखे का शिकार होगा। नतीजतन दुनिया में तकरीब 150 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। जंगलों में आग लगने की घटनाओं में बढ़ोतरी होगी। इसका सबसे ज्यादा असर भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण योरोप, मध्य अमरीका व दक्षिण आस्ट्रेलिया पर पड़ेगा। एक चैंकाने वाला खतरनाक संकेत यह भी है कि दुनिया की पर्याप्त इसके बावजूद हालात की भयावहता की ओर किसी का ध्यान नहीं है।

यह कि यदि धरती का तापमान वर्तमान से दो गुना और बढ़ गया तो धरती का एक चैथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा। दुनिया का 20 से 30 फीसदी हिस्सा सूखे का शिकार होगा। नतीजतन दुनिया में तकरीब 150 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। जंगलों में आग लगने की घटनाओं में बढ़ोतरी होगी। इसका सबसे ज्यादा असर भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण योरोप, मध्य अमरीका व दक्षिण ऑस्ट्रेलिया पर पड़ेगा। एक चैंकाने वाला खतरनाक संकेत यह भी है कि दुनिया की पर्याप्त या अच्छी गुणवत्ता वाली खेतिहर जमीन बंजर होने की ओर तेजी से बढ़ रही है।

दुनिया में बीते चार दशकों में धरती की एक तिहाई जमीन की उर्वरा शक्ति कम हुई है। इसे नहीं रोका गया तो भविष्य में दुनिया की बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए खेती के अलावा दूसरे संसाधनों पर निर्भरता ब़ढ़ जायेगी। इन हालात में आने वाले 30 सालों में दक्षिण एशिया यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका को इस चुनौती का गंभीरता से सामना करना होगा। इन इलाकों में सदी के अंत तक तापमान 50 डिग्री के पार पहुंच जायेगा। नतीजन आदमी का जीना मुहाल हो जाएगा और आबादी ठंडे प्रदेशों की ओर कूच करने को विवश होगी।

देखा जाये तो 40 साल बाद दुनिया की तत्कालीन आबादी का पेट भरने के लिए 50 फीसदी ज्यादा भोजन की जरूरत होगी। जिस तेजी से जमीन अपने गुण खोती जा रही है उसे देखते हुए अनुपजाउ जमीन ढाई गुणा से अधिक बढ़ जायेगी। इसका खामियाजा पहले से सूखे का सामना कर रहे इलाकों को उठाना पड़ेगा। इससे खाद्यान्न प्रभावित होगा और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसमें दो राय नहीं कि दावे कुछ भी किये जायें पर्यावरण बचाने की वैश्विक मुहिम आज भी अनसुलझी पहेली है। दुनिया के वैज्ञानिकों के शोध-अध्ययन इस बात के सबूत हैं कि हालात बहुत भयावह हैं। ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को नजरअंदाज करना बहुत बड़ी भूल होगी। इसलिए अब भी चेतो। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् है)

अपनी सलाह दे (देश की आवाज)

Please enter your comment!
Please enter your name here