वैश्विक तापमान के खिलाफ यूरोप के लाखों लोग सड़कों पर

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ज्ञानेंद्र रावत

बीते दिनों वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के खिलाफ नए सिरे से कदम उठाने और विश्व नेताओं पर दबाव बनाने के लिए यूरोप में लाखों लोग सड़क पर उतरे। कारण तापमान में दिनोंदिन हो रही बढ़ोतरी समूची दुनिया के लिए भीषण खतरा बनती जा रही है। दुनिया के वैज्ञानिक सबसे अधिक इसी बात से चिंतित हैं। कारण वर्तमान में हरेक व्यक्ति की चिंता यही है कि साल-दर-साल गर्मी तो इतनी बढ़ती जा रही है, बारिश भी हो रही है लेकिन इसमें कमी नहीं हो रही है। विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की एकमुश्त राय है कि इसके लिए भूमण्डलीय उष्मीकरण और वातावरण में बढ़ता प्रदूषण पूरी तरह जिम्मेवार है। वैज्ञानिक भाषा में इसको हरित गृह प्रभाव कहते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि हरित गृह प्रभाव है क्या?

असलियत में हमारा वायुमंडल कई परतों से घिरा है। इनमें ऑक्सीजन,हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाई ऑक्साइडआदि कई प्रकार की गैसें हैं। जब सूर्य की किरणें और गर्मी इस वातावरण से गुजरती हैं, तब वायुमंडल गर्म हो जाता है। उस दशा में गर्मी का कुछ हिस्सा पृथ्वी और कुछ हिस्सा आसमान की तरफ उत्सर्जित होता है। इस प्रकार पृथ्वी का तापमान संतुलित रहता है। उद्योगों, वाहनों और इंसान की जीवन शैली की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन और दूसरी गैसें वातावरण में उत्पन्न होती हैं। इन्हीं को हरित गृह गैसें कहते हैं। यह अविरक्त विकिरण को रोक लेती हैं जिससे यह पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर नहीं जा पाती हैं। वातावरण में जैसे-जैसे हरित गृह गैसें घनी होती जाती हैं, वैसे वातावरण की गर्मी अंतरिक्ष में न जाकर पृथ्वी पर ही रह जाती हैं,

नतीजतन पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जाता है।

इस दिशा में दुनिया के वैज्ञानिक विभिन्न प्रकार के उपायों पर शोध कर रहे हैं। कारनेल यूनीवर्सिटी अमेरिका के प्रोफेसर जे. लेहमैन के अनुसंधान से अब यह स्पष्ट हो गया है कि कार्बन डाई ऑक्साइड पृथ्वी के वायुमंडल से पेड़ों के पदार्थ का पाइरोलाइजिंग करके निष्कासित की जा सकती है।

इस प्रक्रिया में गैस और टार निकलता है जिसे शक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया अपने पीछे ठोस बायोचाट छोड़ता है जिसे मिट्टी में दबाया जा सकता है। चूंकि कार्बन वायुमंडल से हटा दी जा रही है, इसलिए इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में कार्बन निगेटिव दृष्टिकोण कहते हैं।

इंसानों और पेड़ों के बीच के सम्बंध को नकारा नहीं जा सकता।

पेड़ हमें आॅक्सीजन देते हैं जो मानव जीवन के अस्तित्व के लिए परमावश्यक है। वे उन गैसों को अपने अंदर सोख लेते हैं जिन्हें हम निकालते हैं। पेड़ हमारे द्वारा परित्याग की हुई चीजों को अपने अंदर लेते हैं और हमें खाना देते हैं। इस प्रकार यह सम्बंध पुनः हमको बचाते हैं।

उदाहरण स्वरूप हम एक छोटे से पेड़ की एक डाल लेकर उसे जलाये तो हम पाते हैं कि लौ के साथ धुआं निकलता है। यह धुआं कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, मीथेन और दूसरी गैसें हैं जो आग की लौ जलाने के लिए जिम्मेवार हैं।

परन्तु पूरी तरह न जल पाने के कारण धुआं वायुमंडल में जाता है। यह कार्बन पाॅजिटिव दृष्टिकोण है। ऐसा ही कोयला, तेल, जीवाश्म ईंधन आधारित प्रौद्यौगिकी में होता है। दूसरी दशा में वही सूखी डाल जमीन पर गिरती है जो बारिश में सड़ कर जमीन की मिट्टी में मिल जाती है। उपरोक्त गैसें जो आंखों से दिखाई नहीं देती हैं। जबकि ठोस पदार्थ को पृथ्वी कार्बन के रूप में सोख लेती है।

वह पेड़ों को पोषण प्रदान करती है।

पौधे वायुमंडल और जमीन से कार्बन डाई ऑक्साइडव कार्बन और दूसरी गैसें लेकर सूरज की रोशनी में फोटोसिन्थेसिस द्वारा क्लोरोफिल पैदा करते हैं। इस अवस्था में कार्बन वायुमंडल में नहीं जाता। इसलिए इसे कार्बन न्यूट्र्ल कहते हैं। तीसरी दशा में वही सूखी पेड़ की डाल बंद वातावरण में जलाते हैं। इससे उत्पन्न धुएं को बुड गैस कहते हैं जिसे इकट्ठा किया जाता है। इस प्रक्रिया को पाइरोलाइसिस कहते हैं। इससे पैदा जले हुए ढेर को बायोचाट कहते हैं। उसे वापस जमीन में बदलाव के लिए डाला जाता है। बायोचाट पौधों में पानी और दूसरे पोषक तत्वों को रोककर रखने में मदद करता है और कार्बन डाई ऑक्साइडव व दूसरी गैसें वायुमंडल से लेकर क्लोरोफिल बनाने के लिए पौघों को देता है।

गौरतलब है कि पौधे वायुमंडल में और पेड़ अपनी बढोतरी के लिए वातावरण में हरित गृह गैस को शोषित करते हैं।

वायुमंडल से कार्बन हटाने के लिए इस प्रक्रिया को कार्बन निगेटिव कहते हैं। इसका बहुत ही दूरगामी प्रभाव है जिसके चलते धरती पर जीवन बना रहेगा। दूसरे शब्दों में यह ईश्वर के इस अद्भुत उपहार पेड़ रूपी प्रकृति की मशीन है जो खतरनाक गैसों को पकड़कर उसे घने ठोस पदार्थ में बदल देती है। अनुमानतः एक किलो लकड़ी लगभग 1 से 6 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड रखती है। एक किलो कार्बन डाई ऑक्साइड लगभग 590 लीटर घनत्व लेती है। इसलिए एक किलो लकड़ी अपने में लगभग 1000 लीटर कार्बन डाई ऑक्साइड संग्रहीत करती है। विचारणीय यह है कि इससे बढ़िया कौन सी मशीन होगी जिसे हम सहजता से न केवल चला सकते हैं बल्कि उसके जरिये हम सबसे ज्यादा गंभीर समस्या को सुलझा भी सकते हैं।

अब हम वायुमंडल की गर्मी को लें, औद्यौगिक क्रांति के फलस्वरूप हमारी कार्बन पाॅजिटिव जीवनशैली के चलते कार्बन डाई ऑक्साइड और दूसरी हानिकारक गैसें वायुमंडल में इकट्ठा हो रही हैं। असलियत यह है कि 1950 में वायुमंडल में कार्बन का घनत्व 300 पीपीएम था जो 2018 में बढ़कर 412 पीपीएम हो गया।

देखा जाये तो एक पीपीएम बराबर है 2.12 जी.टी.। यानी गीगाटन का अर्थ है 1,000,000,000,000 किलो अर्थात 2.12 बिलियन मीट्र्कि टन कार्बन। निष्कर्ष यह कि बीते 70 वर्षों में 2.12 जी.टी. कार्बन इकट्ठा हो गया है।

1950 में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस था जो अब बढ़कर 50 से भी उपर 52 तक पहुंच गया है।

ऐसी स्थिति में बढते पीपीएम और तापमान को रोकने का क्या कोई उपाय है। हां है। इसके लिए 112 पीपीएम यानी कार्बन ऋण $ सालाना कार्बन जोड़ को हटाने की योजना बनानी पड़ेगी। इसको यदि बीस वर्षीय योजना के आधार पर बांटें तो इसका अर्थ होगा 5.6 पीपीएम $ 10 पीपीएम बराबर 15.6 पीपीएम। इसका अर्थ है 15.06 गुणा 2.12 जी.टी. बराबर 33.07 जी.टी. अथवा 33 गीगाटन। इसको सात बिलियन व्यक्तियों में बराबर-बराबर बांटें तो यह 33 जी.टी./7 बिलियन बराबर 4.7 मीट्र्कि टन सालाना प्रति व्यक्ति। यानी 13 किलो प्रति व्यक्ति रोजाना जिसका प्रबंधन सुगमता से संभव है।

व्यक्ति की कार्यशैली के आधार पर देखें तो हरेक व्यक्ति की कार्यशैली से उत्पन्न उर्जा को तीन भागों में बांटा जा सकता है। एक-गर्म करना या भोजन बनाना। दो-बिजली। तीन-यातायात। इसके अलावा औद्योगिक उपयोग भी 13 किलो के आंकड़े में सहयोगी हो सकता है। गाय या अन्य पालतू जानवरों की भी अहम् भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। एक गाय 8 से 10 किलो चारा खाती है।

दूध के अलावा लगभग 5 किलो गोबर देती है। इस प्रकार एक गाय 4से 5 किलो कार्बन हटाने के लिए जिम्मेदार होती है। इस गोबर को बायो गैस बनाने व उर्जा संचयन में उपयोग किये जाने से 6 से 8 किलो कार्बन कम करने में मदद मिलेगी। लकड़ी को पाइलोराइज करके उत्पन्न बायोचाट का जमीन में बदलाव किये जाने, भारी धातुओं को सोख कर भूमि सुधार, उद्योगों और पानी को साफ करने में उपयोग किया जा सकता है।

कृषि में इसके इस्तेमाल से उपज में 200 से 300 फीसदी की बढ़ोतरी की जा सकती है। इसमें दो राय नहीं कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके जैव ईंधन के प्रचुरता से प्रयोग किये जाने की स्थिति में निश्चित ही ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते प्रभाव में कमी आयेगी।

यह समय की मांग है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति हो या न हो, यह सर्वप्रिय का आंदोलन होना चाहिए। इसके कारण 13 किलो कार्बन प्रति व्यक्ति का आंकडा भी दिन-ब-दिन कम होता जायेगा। इससे जहां कार्बन उत्र्सजन कम कर प्रकृति को राहत मिलेगी, पर्यावरण सुधरेगा, वहीं प्राणी मात्र के स्वास्थ्य में सुधार की आशा भी बलवती होगी। यह निश्चित है।
(डा. एस. मुरलीधर राव नासा के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक, विशेषज्ञ आई.ओ.पी., एकेडमिया सिनिका, ताईपी, ताइवान एव बी.ए.आर.सी. के संस्थापक से बातचीत पर आधारित लेख)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् है)

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