पृथ्वी दिवस पर विशेष : अब समय ठोस कदम उठाने का है

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अतुल्य लोकतंत्र के लिए प्रशांत सिन्हा की कलम से…
पूरे विश्व में साल में दो दिन 21 मार्च और 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। लेकिन 1970 से हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व पृथ्वी दिवस का सामाजिक और राजनैतिक महत्व है। 1969 में कैलिफोर्निया के सांता बारबरा में तेल रिसाव हुआ जिससे भारी तबाही हुई। भीषण जन-धन की हानि भी हुई। इस तबाही के दौरान दस हजार से भी ज्यादा समुद्री मछली, डॉलफिन, सील इत्यादि मौत के गाल में समा गए । इससे अमेरिकी सासंद गेलार्ड नेल्सन बेहद दुखी हुए और उन्होंने पर्यावरण को लेकर कुछ करने का फैसला किया।
1970 में इस दिन लगभग दो करोड़ अमेरिकी लोगों ने पृथ्वी दिवस के पहले आयोजन में भाग लिया जिसमें समाज के हर वर्ग और क्षेत्र के हजारों लोग शामिल हुए । इस प्रकार यह आंदोलन आधुनिक समय के सबसे बड़े पर्यावरण आंदोलन में बदल गया। उसके बाद समय-समय पर
कुछ पर्यावरण प्रेमी, प्रबुद्ध समाज, स्वैच्छिक संगठन समुद्र में तेल फैलने की घटनाओं को रोकने , नदियों में उद्योगों के रसायन युक्त विषैला गंदा पानी डालने वाली कम्पनियों को रोकने, जहरीला कूड़ा इधर उधर फैंकने और जंगलों को निर्ममता पूर्वक काटने वाली आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्रदर्शन किये जाते रहे हैं और आज भी करते हैं जो कि मौजूदा दौर में नाकाफी प्रतीत होते हैं।
यहां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पृथ्वी दिवस को लेकर देश और दुनिया में जागरूकता का भारी अभाव है। सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही स्तर पर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। बस औपचारिकताएं पूरी कर अपने कर्तव्य की सरकारें इतिश्री कर शांत बैठ जाती हैं। हां यह सच है कग कुछ ही पर्यावरण प्रेमी अपने दायित्व को समझते हुए निजी स्तर पर कोशिश अवश्य करते रहे हैं किन्तु यह विषय किसी एक व्यक्ति, संस्था या समाज की चिंता तक सीमित नहीं होना चाहिए। सभी को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इसमें कुछ न कुछ सहयोग कहें या भागीदारी अवश्य करनी होगी। असलियत यह है कि पृथ्वी को बचाने के लिए जन संकल्प की बेहद जरुरत है। यह समय की मांग है। पृथ्वी को बचाने के लिए जन संकल्प का अर्थ है कि सभी को इस दिशा में पहल करने की आवश्यकता है। इसके लिए किसी एक दिन को ही माध्यम बनाया जाए, यह उचित नहीं है। पृथ्वी बहुत व्यापक शब्द है, वह हमारा आधार है जिसमें जल, हरियाली, वन्य प्राणी सहित बहुतेरे अन्य कारक भी हैं। हमारी पृथ्वी एक मात्र ऐसा ग्रह है जहां जीवन संभव है। पृथ्वी पर जीवन को बचाए रखने लिए पृथ्वी की प्राकृतिक संपत्ति को बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। लेकिन इंसान धरती के संसाधनों का निर्दयतापूर्वक इस्तेमाल कर रहा है। यह बेहद दुखद है और चिंतनीय भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ओजोन परत में क्षरण है जो हमें सूर्य की घातक किरणों से बचाता है। वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। भूजल का दूषित होना आज की कटु वास्तविकता है। भूजल का स्तर दिन ब दिन घटता चला जा रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्ध और जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम समुद्री जल स्तर के बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। वाहन और उद्योग भी वायु प्रदूषण में महती भूमिका निबाह रहे हैं। प्लास्टिक कचरा पूरे पारिस्थितिक तंत्र को अवरूद्ध कर रहा है और लैंडफिल शहरों के क्षितिज में छा रहे हैं। नतीजन सांस, फेफडे़, लिवर, आंत आदि घातक बीमारियों के कारण बन रहे हैं।
पर्यावरण प्रदूषण इस गिरावट का संकेत ही नहीं दे रहा है बल्कि जीता जागता सबूत है जो मानव जीवन के लिए भीषण खतरा बन चुका है। बार – बार बाढ़, सूखा अप्रत्याशित मौसम चक्र में बदलाब,फसल चक्र में बदलाव , तटीय क्षेत्रों का पीछे हटना ऐसे ही कुछ बदलाव हैं जो मानव जाति के अस्तित्व पर मंडरा रहे हैं। कई दशकों से हो रही पर्यावरण से अनवरत छेड़ छाड़ अंततः पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के समक्ष खतरा पैदा कर रहा है जिसमें हम जी रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल लगातार गर्म हो रहा है और इसके चलते ही अंटार्टिका के साथ ग्रीन लैंड में भी मौजूद बर्फ की चादर तेजी से पिघल रही है। अनुमान है कि 2050 तक अधिकांश ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे। इसमें हिमालय के छोटे-बडे़ ग्लेशियर भी शामिल हैं। इसलिए अब हमे चेत जाना होगा। क्योंकि अब समय नहीं बचा है। दुखद बात तो यह है कि अब भी हमारे कार्य- व्यवहार पर यथा स्थितिवाद हावी दिख रहा है। जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारक प्रदूषण के मुददे पर अभी भी उसके अपेक्षित नतीजे नहीं सामने दिख रहे हैं। इस मामले में नीति निर्धारकों ने गम्भीरता तो दिखाई लेकिन उसके अपेक्षित नतीजे अभीतक सामने नही आये हैं। इसका कारण समाज में जागरूकता की बेहद कमी है। कुछ लोगों ने इस दिशा में पहल की है लेकिन वह नाकाफी है। यदि प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण सरंक्षण के प्रति हमारी उदासीनता दूर नहीं हुई तो आने वाला समय बेहद भयावह होगा, जिसकी भरपायी असंभव होगी। दरअसल आजकल सरकारों का जोर लोक लुभावन नीतियों पर है, जीवन के आधार पर्यावरण संरक्षण पर नहीं। यही चिंता की असली वजह है। जरूरत है सरकार को विकास के साथ – साथ प्रकृति को सहेजने वाली नीतियां बनाने की। अब समय आ गया है कि हमें बुनियादी बातों को समझना होगा कि पर्यावरण सरंक्षण केवल शासन- प्रशासन का काम नहीं है,इसमें हर व्यक्ति का योगदान जरूरी है।
युवाओं में पृथ्वी बचाओ से संबंधित जागरूकता को बढ़ावा देने के संदर्भ में उनके अध्ययन में यह विषय शामिल करना चाहिए। उन्हें पर्यावरण के बारे में जागरूकता लाने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में आयोजित वृक्षारोपण, बैनर बनाने, नारे लिखने, निर्धारित विषय पर आधारित नाट्य -प्रदर्शन व प्रतियोगिताओं आदि मे भाग लेना चाहिए।

पृथ्वी दिवस को हम कई प्रकार से मना सकते हैं। पौधारोपण,भूमि और जल प्रदूषण को टालने के लिए प्लास्टिक थैलों के इस्तेमाल मे कमी लाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना,
सड़क, पार्क और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर उन्हें गंदगी हटाने के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए। विभिन्न उपलब्ध व्यवहारिक संसाधनों के द्वारा ऊर्जा सरंक्षण के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। लोगों को शिक्षा देनी चाहिए कि पृथ्वी को हम हर पल भोगते हैं, इसलिए हमारे लिए हर दिन पृथ्वी दिवस है। इसलिये हर दिन उन्हें धरती का ख्याल रखना चाहिए। लोगों को पृथ्वी की सुरक्षा से संबंधित गतिविधियों के बारे में दिनों दिन बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग और दूसरी पर्यावरणीय संबंधित तबाही से बचाने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने के लिए मजबूर करना चाहिए।

महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि प्रकृति में इतनी ताकत है कि वह वह प्रत्येक मनुष्य की जरुरत को पूरा कर सकती है लेकिन पृथ्वी कभी भी मनुष्य के ” लालच ” को पूरा नहीं कर सकती है। इसलिए हमें अपनी जीवनशैली बदलते हुए प्रकृति से जुड़ना चाहिए, तभी कुछ बदलाब की उम्मीद की जा सकती है।

(लेखक जाने-माने समाज सेवी व पर्यावरण मामलों के जानकार हैं।)

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