जलवायु परिवर्तन का परिणाम है तौकते का कहर –ज्ञानेन्द्र रावत

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अतुल्य लोकतंत्र के लिए वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद् ज्ञानेन्द्र सिंह रावत की कलम से…

बीती 14 मई से अरब सागर में उठे और केरल, कर्नाटक में कोहराम मचाते हुए तौकते नामक चक्रवाती तूफान ने बीते दिवस महाराष्ट्र में भारी तबाही मचाई। 185 किलोमीटर की रफ्तार से चल रही हवाओं से सैकडो़ं पेड़ उखड़ कर गिर गये, उनके नीचे वाहन, इंसान और जीव-जंतु दब गये। सैकडो़ घर क्षतिग्रस्त हुए। 184-186 मिलीमीटर बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ। यातायात प्रभावित हुआ, हवाई उडा़नें ठप्प रहीं। मुंबई हवाई अड्डा ग्यारह घंटे बंद रहा और आने-जाने वाली 56 उडा़नों को रद्द करना पडा़। सी लिंक को भी यातायात के लिए बंद करना पडा़। नगरीय रेल सेवा भी बाधित हुई। कहीं -कहीं बिजली काट दी गयी। बहुतेरे कोविड सेंटर भी तबाह हो गये।मुंबई, ठाणे, रायगढ़, सिंधुदुर्ग आदि समूचे कोंकण क्षेत्र में भारी बारिश और तेज हवाओं से बिजली के खंभे गिरने से जनजीवन के साथ संचार सेवाएं बाधित हो गयीं। रायगढ़ में तो 1886 घर क्षतिग्रस्त हुए हैं। कई नावें डूब गयी हैं और उनके नाविकों का अभी तक कोई पता नहीं लग सका है। समुद्र में बजरों में फंसे 410 लोगों को निकालने में नौसेना के आईएनएस कोच्चि, बेतवा,तेग और कोलकाता नामक पोत के अलावा पी 8 आई विमान और चेतक, सी किंग व एएलएच हैलीकाप्टर लगे हुए हैं। ओएनजीसी के तेल कुंए हीरा के पास लंगर डाले खडा़ बार्ज -305 पर सवार 261 में से 186 बचा लिए गये हैं, 26 के शव मिले हैं जबकि 49अब भी लापता हैं। जबकि बार्ज जीएएस कंसट्रक्टर से सभी 137, बार्ज एस एस-3 से सभी 196 और आयल रिंग सागर भूषण पर सवार सभी 101 लोगों को नौसेना और कोस्ट गार्ड की टीमों ने बचा लिया है। सबसे बडी़ बात तो यह रही कि बार्ज-305 जो तेज हवाओं के चलते बहने लगा था और किसी चट्टान से टकराने के बाद उसके तल में छेद हो गया था, तब उस पर सवार 261 लोग लाइफ जैकेट पहन समुद्र में कूद गये थे, में से 186 को बचाने में नौसेना और कोस्टगार्ड की टीमें कामयाब रहीं। यहां सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि तूफान की चेतावनी मिलने के बाद भी बार्ज-305 समुद्र में तेल के कुंए के पास क्यों खडा़ रहा। महाराष्ट्र के बाद 210 किलोमीटर की रफ्तार से आगे बढ़ रहे इस तूफान ने गुजरात में भारी तबाही मचाई जहां 16,500 से भी ज्यादा घर तबाह हो गये हैं और 650 से ज्यादा सड़कें ब्लाक हो गयीं। उस हालत में जबकि एहतियातन तकरीब डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया था। बारिश और आंधी से बचाव व राहत कार्यों में यहां बाधा आ रही है। एनडीआरएफ और सेना की टीमें विषम स्थितियों में भी बचाव कार्यों को अंजाम दे रही हैं।

दरअसल बीते साल मई में आये अम्फान तूफान जिसका असर पश्चिम बंगाल सहित त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम और आंध्र में हुआ था, जून में आये निसर्ग तूफान जिसका असर महाराष्ट्र और गुजरात में हुआ थाऔर नवम्बर में आये निवार तूफान जिसने तमिलनाडु में भारी तबाही मचाई थी, से भी अधिक खतरनाक यह तौकते तूफान है। वैज्ञानिकों ने इसे बेहद
गंभीर तूफान करार दिया है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ और तेज हवाओं की भयंकर गति का इसे भयावह बनाने में अहम योगदान है जिसने सात राज्यों को अपनी चपेट में ले लिया है। गौरतलब है कि ऐसे तूफानों का प्रमुख कारण समुद्र के गर्भ में मौसम की गर्मी से हवा के गर्म होने के चलते कम वायु दाब के क्षेत्र का निर्माण करना है। ऐसा होने पर गर्म हवा तेजी से ऊपर उठती है जो ऊपर की नमी से मिलकर संघनन से बादल बनाती है। इस वजह से बनी खाली जगह को भरने के लिए नम हवा तेजी से नीचे जाकर ऊपर उठकर आती है। जब हवा तेजी से उस क्षेत्र के चारो तरफ घूमती है, उस दशा में बने घने बादल बिजली के साथ मूसलाधार बारिश करते हैं। जलवायु परिवर्तन ने ऐसी स्थिति को और बढा़ने में मदद की है या यूं कहें कि प्रमुख भूमिका निबाही है।
दरअसल जलवायु परिवर्तन आज एक ऐसी अनसुलझी पहेली है जिससे हमारा देश ही नहीं, समूची दुनिया जूझ रही है। जलवायु परिवर्तन और इससे पारिस्थितिकी में आये बदलाव के चलते जो अप्रत्याशित घटनाएं सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए इस बात की प्रबल संभावना है कि इस सदी के अंत तक धरती का काफी हदतक स्वरूप ही बदल जायेगा। इस विनाश के लिए जल, जंगल और जमीन का अति दोहन जिम्मेवार है। बढ़ते तापमान ने इसमें अहम भूमिका निबाही है। वैश्विक तापमान में यदि इसी तर बढो़तरी जारी रही तो इस बात की चेतावनी तो दुनिया के शोध अध्ययन बहुत पहले ही दे चुके हैं कि आने वाले समय में दुनिया में 2005 में दक्षिण अमरीका में तबाही मचाने वाले आये कैटरीना नायक तूफान से भी भयानक तूफान आयेंगे। सूखा और बाढ़ जैसी घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी होगी। जहां तक तूफानों का सवाल है, समुद्र के तापमान में बढो़तरी होने से स्वाभाविक तौरपर तूफान भयंकर हो उठते हैं। क्योंकि वह गर्म समुद्र की ऊर्जा को साथ ले लेते हैं। इससे भारी वर्षा होती है। कारण वैश्विक ताप के कारण हवा में जल वाष्प बन जाता है।
तापमान में बढो़तरी की रफ्तार इसी गति से जारी रही तो धरती का एक चौथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो जायेगा। दुनिया में भयंकर सूखा पडे़गा। परिणामतः दुनिया का बीस-तीस फीसदी हिस्सा सूखे का शिकार होगा। इससे दुनिया के 150 करोड़ लोग सीधे प्रभावित होंगे।इसका सीधा असर खाद्यान्न, प्राकृतिक संसाधन, और पेयजल पर पडे़गा। नतीजतन आदमी का जीना मुहाल हो जायेगा। इसके चलते अधिसंख्य आबादी वाले इलाके खाद्यान की समस्या के चलते खाली हो जायेंगे और बहुसंख्य आबादी ठंडे प्रदेशों की ओर कूच करने को बाध्य होगी। जिस तेजी से जमीन अपने गुण खोती चली जा रही है उसे देखते हुए अनुपजाऊ जमीन ढाई गुणा से भी अधिक बढ़ जायेगी। इससे बरसों से सूखे का सामना कर रहे देश के 630 जिलों में से 233 को ज्यादा परेशानी का सामना करना पडे़गा। कहने का तात्पर्य यह कि देश में पहले से सूखे के संकट में और इजाफा होगा। निष्कर्षतः बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए खेती के अलावा दूसरे संसाधनों पर निर्भरता बढ़ जायेगी। उस स्थिति में तो और जबकि 11.3 करोड़ लोग दुनिया में भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं। ऐसी हालत में दूसरे साधनों पर निर्भरता और बढे़गी। दुनिया की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही होगी। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। इससे खाद्यान्न तो प्रभावित होगा ही, अर्थ व्यवस्था पर भी भारी प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ऐसी स्थिति में जल संकट बढे़गा, उस स्थिति में और जबकि इक्कीस करोड़ लोगों ने जल संकट के चलते विस्थापन का दंश झेला हो।बीमारियां बढे़ंगी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आयेगी, ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी, नतीजतन दुनिया के कई देश पानी में डूब जायेंगे। समुद्र का जलस्तर तेजी से बढे़गा और समुद्र किनारे के सैकडो़ की तादाद में बसे नगर-महानगर जलमग्न तो होंगे ही, तकरीब बीस लाख से ज्यादा की तादाद में प्रजातियां सदा के लिए खत्म हो जायेंगी। जीवन के आधार रहे खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व कम हो जायेंगे। कहने का तात्पर्य यह कि उनका स्वाद ही खत्म हो जायेगा। खाद्य पदार्थों में पाये जाने वाले विटामिन्स की कमी इसका जीता जागता सबूत है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में बढो़तरी और उससे उपजी जलवायु परिवर्तन की ही समस्या का परिणाम है कि आर्कटिक महासागर की बर्फ हर दशक में तेरह फीसदी की दर से पिघल रही है, जो अब केवल 3.4 मीटर की ही परत बची है,यदि वह भी खत्म हो गयी तब क्या होगा?

समस्या यह है कि हम अपने सामने के खतरे को जानबूझ कर नजर अंदाज करते जा रहे हैं जबकि हम भलीभांति जानते हैं कि इसका दुष्परिणाम क्या होगा? यह भी कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण मौसम के रौद्र रूप ने पूरी दुनिया को तबाही के कगार पर ला खडा़ किया है। तकरीबन डेढ़ लाख से ज्यादा लोग दुनिया में समय से पहले बाढ़, तूफान और प्रदूषण के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। बीमारियों से होने वाली मौतों का आंकडा़ भी हर साल ढाई लाख से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। कारण जलवायु परिवर्तन से मनुष्य को उसके अनुरूप ढालने की क्षमता को हम काफी पीछे छोड़ चुके हैं। महासागरों का तापमान उच्चतम स्तर पर है। 150 साल पहले की तुलना में समुद्र अब एक चौथाई अम्लीय है। इससे समुद्री पारिस्थितिकी जिस पर अरबों लोग निर्भर हैं, पर भीषण खतरा पैदा हो गया है। दर असल इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकारों का इस ओर किसी किस्म का सोच ही नहीं है। वह विकास को पर्यावरण का आधार बनाना ही नहीं चाहतीं। वर्तमान में यह दुर्दशा प्रकृति और मानव के विलगाव की ही परिणति है। निष्कर्ष यह कि जब तक जल, जंगल और जमीन के अति दोहन पर अंकुश नहीं लगेगा, तब तक जलवायु परिवर्तन से उपजी चुनौतियां बढ़ती ही चली जायेंगी और उस दशा में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष अधूरा ही रहेगा।

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