डाकिया डाक लाया एक गीत बनकर रह गया…

Kurukshetra/Rakesh Sharma : फिल्म पलकों की छांव गुलजार के द्वारा गाया गया गीत डाकिया डाक लाया जो चिट्ठी प़त्री की अहमियत को समझाने के लिए षायद काफी था। जिस प्यार ओर दिल की भावनाओं से अपने सगे सम्बधियों को चिट्ठी पत्र लिखा जाता था उससे उनके अपने पास होने की झलक साफ दिखाई देती थी। चिट्ठी के लिए इंतजार करना भी मुष्किल नही लगता था जब कोई प़त्र घर पर डाकिये के द्वारा दिया जाता था तो खुषियों का ठिकाना नही रहता था। डाक के माध्यम से भेजे जाने वाले पत्र का इंतजार करना सकुन देने वाला था सुख दुख से लेकर षादी के पत्र डाक द्वारा ही भेजे जाते थे क्योंकि कोई दुसरा माध्यम नही था।

घर के आंगन में आई चिट्ठी जिसको सब साथ साथ सुना करते थे ओर जब किसी चिट्ठी का किनारा पटा हुआ मिलता था तो उसके खोलने से पहले ही अंदेषा हो जाता था कि कही ना कही कोई अनहोनी हुई है। बडा गर्व होता था जब डाकिया परिवार में सगे सम्बंधी की चिट्ठी लेकर आता था ओर डाकिये को देखने मात्र से दिल खुष हो जाता था। ग्रामीण क्षेत्र में पढें लिखे से चिट्ठी लिखवाने के लिए प्रार्थना करना भी सुखद था स्कूली पाठयकम्र में बच्चों को दोस्त, पिता ओर भाई आदि के पास पत्र लिखने केा आता था जिसके कारण स्कूल में ही पत्र की अहमियता को समझा जाता था कि किस प्रकार पत्र लेखन हमसब को जोडता है।

लेकिन समय के साथ साथ सब कुछ बदल गया चिट्ठी युग का अंत हुआ तो मोबाइल युग का प्रारंभ हुआ जिसके कारण ये समझ पाना मुष्किल है कि हम अपनों के पास आये या फिर उनसे दुर होते चले गये। इंटरनेट, फोन, मोबाइल के इस युग में पत्र लेखन की परंपरा को धीरे धीरे समाप्त कर दिया जिसके कारण भावनाओं को समझ पाना ही मुष्किल हो गया कि किस भाव से संदेष लिखा जा रहा है। इससे पूर्व में घर से बहार जाते समय भी कहा जाता था कि पहुंचते ही पत्र लिखना कि मै ठीक ठाक पहंुच गये हो। लेकिन मोबाइल युग के मक्कड जाल में बडो से से लेकर बच्चें ऐसे फंस गये है कि पत्रों की अहमियत को ही भूला चूके है लेकिन मोबाइल फोन के इस युग में अब हमारे पास चिट्ठी जैसी कोई भी चीज नही जिसको भविश्य में किसी को दिखा सके। मोबाइल फोन से ही सगे सम्बधियों को सुख दुख की सुचना से लेकर साल के पर्व की बधाई देकर हम अपना दायित्व पुरा कर रहे है जो की एक बनावटी रिष्ता बनता जा रहा है।

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