कोरोना में पार्किंसंस बीमारी की दवाई न छोड़े मरीज : डा. रोहित गुप्ता

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फरीदाबाद। विश्व पार्किंसंस दिवस के अवसर पर नीलम चौक स्थित एस्कोर्ट फोर्टिस अस्पताल में जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में लोगों को पार्किंसंस रोग के लक्षण और बचाव की जानकारी दी गई। अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग डायरेक्टर डॉ. रोहित गुप्ता ने बताया की पार्किंसंस रोग पहले के तुलना में अब तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा की अगर किसी व्यक्ति के हाथ, पैर या शरीर का कोई अन्य हिस्सा कंपकपाने की समस्या है तो इसे नजर अंदाज न करें। यह पार्किंसन बीमारी हो सकती है। इसका तुरंत इलाज करवाएं। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रोहित गुप्ता ने बताया कि पार्किंसंस बीमारी उम्रदराज लोगों की बीमारी है। खासतौर से 60 साल की उम्र के लोगों में ये समस्या होती है। ये न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसमें शरीर में कंपन होता है। यह इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि शारीरिक गतिविधियां रुक जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, तकरीबन 10 प्रतिशत लोगों में पार्किंसंस की समस्या युवावस्था में देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा की कई लोगों को ये 40 की उम्र में हो रहा है तो कई किशोरावस्था में ही चपेट में आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि पार्किंसंस में कोरोना का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन कुछ लोग कोरोना के डर से पार्किंसंस की दवाइयां छोड़ देते है। ऐसे कई मरीज ओपीडी में इलाज के पहुंच रहे हैं। इससे खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि पार्किंसन रोग में दिमाग में न्यूरॉन कोशिकाएं डोपामीन नामक एक रासायनिक पदार्थ का निर्माण करती हैं। जब डोपामीन का स्तर गिरने लगता है, तो दिमाग शरीर के विभिन्न अंगों पर नियंत्रण रख पाने में असक्षम होता है। आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में इस वक्त लगभग एक करोड़ लोग पार्किंसन बीमारी से प्रभावित हैं। फोर्टिस अस्पताल में रोजाना चार-पांच मरीज इलाज के लिए आते हैं। उन्होंने बताया कि शारीरिक गतिविधि में सुस्ती महसूस करना, शरीर को संतुलित करने में दिक्कत महसूस करना, हंसने और पलकें झपकाने में दिक्कत होना, बोलने की समस्या और लिखने में दिक्कत महसूस करना, हाथों, पैरों, जबड़ों और मांसपेशियों में अकडऩ होना, डिप्रेशन, अनिंद्रा, चबाने, निगलने या बोलने में दिक्कत होना आदि बीमारी के लक्षण है। डॉ. रोहित ने बताया कि पार्किंसंस बीमारी में रोगी को डोपामीन बाहर से दिया जाता है। इससे शरीर में कंपन कम हो जाती है। एडवांस स्तर के इलाज के रोगी के दिमाग में पेसमेकर भी डाले जाते हैं। इससे रोगी ठीक हो जाता है। बीमारी के लक्षण काफी कम हो जाते है। दवाईयां कम हो जाती हैं।

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