आत्मज्ञान से पा सकते है मुक्ति : श्री सजन

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Faridabad/Atulya Loktantra : सतयुग दर्शन वसुन्धरा में आयोजित राम नवमी यज्ञ महोत्सव के द्वितीय दिवस सजनों को जाग्रत करते हुए सतयुग दर्शन ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन ने कहा कि आत्मज्ञान सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है क्युकी हकीकत में जीव, जगत और ब्राहृ का खेल जना यही ह्नदय को आनन्द देने वाला है और इसी द्वारा जीव परमपद यानि मुक्ति पा सकता है। अत: इस महत्ता के दृष्टिगत आत्मज्ञान को अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपल4िध मानो और साथ ही यह भी जानो कि यह उपल4िध विधिवत् गहन आत्मनिरीक्षण के अभाव में असंभव है।नि:संदेह ऐसा करने पर ही हम अपने आत्मिक बल के भरपूर प्रयोग द्वारा अपनी इन्द्रियों और मन को पूरी तरह से वश में रखते हुए, अंतर्निहित मानवीय गुणों में वृद्धि कर सकते है और मानवीयता को पुष्ट कर अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत यानि सुधार कर संशोधित कर श्रेष्ठ मानव बन सकते हैं।

श्री सजन जी ने कहा कि यदि चाहते हो कि अपने मन और इंद्रियों पर पूर्णत: नियंत्रण रख स्वयं का सुधार कर सको तो रात्रि को सोने से पूर्व सही तरीके से अपना आत्मनिरीक्षण करना सुनिश्चित करो। इस हेतु हर तरफ से अपना ख़्याल व ध्यान हटाकर अपने मन पर केन्द्रित करो। इस तरह मन-चित्त जब एकाग्र, निर्मल व शांत हो जाए तो निर्दोषता पूर्ण जीवनयापन करने में सक्षम बनने हेतु आत्मदर्पण में अपने स्वाभाविक रूप को ठीक प्रकार से परखो। निश्चित ही इस प्रकार आत्मनिरीक्षण करने पर आपको उस दर्पण में एक दूसरा ही मनुष्य दिखाई देगा यानि अपना खोटा और कमियों भरा स्वाभाविक रूप नजऱ आएगा। इस रूप को देखकर घबराओ नहीं 1योंकि संसार के सभी पदार्थ, समस्त क्रियायें, संपूर्ण उपल4िधयाँ गुण-दोषमय हैं।उन्होंने आगे कहा कि पूर्ण विजय प्राप्ति के लिए केवल रात्रि में ही नहीं अपितु दिनचर्या के दौरान भी यदा-कदा एक मिनट के लिए स्थिर होकर क्या कर रहे हो, क्या सोच रहे हो इसका विश्लेषण किया करो यानि अपने ख़्याल, वाणी व कर्म तीनों पर निगाहबानी रखा करो।

इस तरह दिन-रात, चारों पहर सदैव सचेत रहो और देखो कि हमारे ह्नदयपटल पर क्या घट रहा है। इस तरह जो मानव धर्म के विरुद्ध हो व जिसे नहीं करना चाहिए उस ओर जब मन आकृष्ट होता प्रतीत हो तो उसे प्रयासपूर्वक रोको यानि वैसा न करने दो। ऐसा करने से आकर्षणों की ओर जाने के लिए मन सहज रूप से रुक जाएगा और प्रसन्नता से प्रभु में लीन रहना उसे अच्छा लगने लगेगा। इसके विपरीत यदि ऐसा न किया तो समुचित नैतिक अंकुश के अभाव में समस्त इन्द्रियाँ विद्रोही हो जाएँगी और मन बुद्धि पर हावी हो सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देगा और आप स्वाभाविक रूप से भ्रष्टाचारी, दुराचारी व व्यभिचारी बन जाओगे।ऐसा न हो इस हेतु सजनों कदम-कदम पर विचार को पकडऩे की आदत डालो। इस संदर्भ में याद रखो कि विचार पर चलने वालों की ही सदा जीत-जीत और फतह-फतह होती है। ऐसा बुद्धिमान मानव ही आत्मविजय प्राप्त कर सकता है। आप भी आत्मनिरीक्षण की इस क्रिया को युक्तिसंगत करके व निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा अपने मन व इन्द्रियों पर सहज ही विजय प्राप्त करने वाले आत्मविजयी बनो और सब दु:खों से छुटकारा पा सुख शांति से भरा आनन्दमय जीवन जीना आरमभ कर दो। अपने जीवन में ऐसा मंगलकारी परिवर्तन लाना अपने व समस्त समाज के कल्याण की बात समझो। अंत में उन्होंने सब सजनों से कहा कि ए विध् अपने पर उपकार व अन्यों पर परोपकार कर परमात्मा के कत्र्तव्यपरायण सपुत्र कहलाओ व विश्राम को पाओ।

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