राष्ट्रपिता की पुण्यतिथि पर ही क्यों मनाया जाता है “विश्व कुष्ठ रोग दिवस”, पढ़िए रिपोर्ट

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File photo

New Delhi/Atulya Loktantra: 30 जनवरी यानि आज राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की पुण्यतिथि है। आज ही के दिन 1948 में नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन में नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को तीन गोलियां मारी थीं जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गयी थी। गाँधी जी अहिंसा के पुजारी थे और आज भी हम उनके प्रति नतमस्तक है। लेकिन एक सवाल सबके जहन में होगा कि आखिर गाँधी जी की पुण्यतिथि पर ही विश्व कुष्ठ रोग दिवस क्यों मनाया जाता है, तो आज हम इस पोस्ट के माधयम से आपके इस सवाल का जवाब देंगे।

दरअसल, गाँधी जी अहिंसा के पुजारी थे और लोगो की सेवा करने में विश्वास रखते थे। वह किसी से भी हीन भावना नहीं रखते थे। उन्होंने कुष्ठ रोगियों की उस समय में सेवा की है जब उन्हें हीन समझा जाता था। कुष्ठ रोगियों को समाज धिक्कारता है, उन कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों से महात्मा गांधी काफी स्नेह और सहानुभूति रखते थे, क्योंकि वे जानते थे कि इस रोग के क्या सामाजिक आयाम हैं। इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन में कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों की काफी सेवा की और कुष्ठ रोगियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बहुत प्रयास किए।

क्या है कुष्ठ रोग
कुष्ठ रोग एक दीर्घकालिक रोग है, जो माइकोबैक्टिरिअम लेप्राई और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमेटॉसिस जैसे जीवाणुओं के कारण होता है। कुष्ठ रोग के रोगाणु की खोज 1873 में हन्सेन ने की थी, इसलिए कुष्ठ रोग को ‘हन्सेन रोग’ भी कहा जाता है। यह रोग मुख्य रूप से मानव त्वचा, ऊपरी श्वसन पथ की श्लेष्मिका, परिधीय तंत्रिकाओं, आंखों और शरीर के कुछ अन्य भागों को प्रभावित करता है।

कुष्ठ रोग के बारे में फैली हुईं भ्रातियां
आज भी समाज में कुष्ठ रोज को लेकर बहुत साडी भ्रांतिया फैली हुई है। लोगो का मानना है कि यदि किसी परिवार में एक व्यक्ति को यह रोग है तो अन्य को भी होगा। जो कि बिलकुल गलत हैं एक रिसर्च के अनुसार 80 प्रतिशत लोगों में कुष्ठ रोग असंक्रामक होता है और 20 प्रतिशत कुष्ठ पीड़ितों का इलाज सही समय से हो जाए तो कुष्ठ रोग कुछ ही दिनों में असंक्रामक हो जाता है। कुछ लोग का मानना हैं कि कुष्ठ रोग का कोई इलाज नहीं है। ऐसा सोचने वाले बिलकुल गलत है कुष्ठ रोग का इलाज है और सही से इलाज कराने से यह जल्द ठीक हो जाता है।

महात्मा गांधी की ने रोगियों के प्रति बदला नजरिया
महात्मा गांधी के प्रयासों की वजह से ही भारत सहित कई देशों में अब कुष्ठ रोगियों को सामाजिक बहिष्कार का सामना नहीं करना पड़ता। अब समाज का अधिकतर तबका समझ गया है कि कुष्ठ रोग कोई दैवीय आपदा नहीं बल्कि एक बीमारी है, जो कि किसी को भी हो सकती है और इसका इलाज संभव है। महात्मा गांधी द्वारा कुष्ठ रोगियों को समाज की मुख्य धारा में जोड़ने के प्रयासों की वजह से ही हर वर्ष 30 जनवरी उनकी पुण्यतिथि को”विश्व कुष्ठ रोग दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

कुष्ठ रोग के संकेत और लक्षण
त्वचा पर घाव होना कुष्ठ रोग के प्राथमिक बाह्य संकेत हैं। यदि इसका उपचार न किया जाए तो कुष्ठरोग पूरे शरीर में फैल सकता है जिससे शरीर की त्वचा, नसों, हाथ-पैरों और आंखों सहित शरीर के कई भागों में स्थायी क्षति हो सकती है। इस रोग से त्वचा के रंग और स्वरूप में परिवर्तन दिखाई देने लगता है। कुष्ठ रोग में त्वचा पर रंगहीन दाग हो जाते हैं जिन पर किसी चुभन का रोगी को कोई असर नहीं होता। इस रोग के कारण शरीर के कई भाग सुन्न भी हो जाते हैं।

कुष्ठ रोग का इलाज
आज चिकित्सा प्रणाली ने इतनी तरक्की कर ली है कि कुष्ठ रोग का इलाज कई वर्ष पूर्व ही संभव हो गया था। आज के समय में इस रोग की मल्टी ड्रग थैरेपी उपलब्ध है। अगर सही इलाज किया जाए तो रोगी निश्चित ही कुष्ठ रोग से मुक्त होकर एक सामान्य जिंदगी जी सकता है। आज कुष्ठ रोग का इलाज 2 प्रकार से हो रहा है। पॉसी-बैसीलरी कुष्ठ रोग (त्वचा पर 1-5 घाव का होना) का उपचार 6 माह तक राइफैम्पिसिन और डैप्सोन से किया जाता है बल्कि मल्टी-बैसीलरी कुष्ठ रोग (त्वचा पर 5 से ज्यादा घाव का होना) का उपचार 12 माह तक राइफैपिसिन, क्लॉफैजिमाइन और डैप्सोन से किया जाता है। सरकारी अस्पताल द्वारा रिहाइशी इलाकों में मौजूद स्वास्थ्य केंद्रों में कुष्ठ रोग का नि:शुल्क इलाज उपलब्ध है।

कुष्ठ रोग की रोकथाम
रोग का पता लगने पर उसका पूरा इलाज कराना चाहिए और बीच में इलाज को छोड़ना नहीं चाहिए। बीसीजी का टीका लगाने से भी कुष्ठ रोग से सुरक्षा प्राप्त होती है। कुष्ठ रोग से जुड़ी हुईं भ्रांतियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए तथा मरीजों और लोगों को इसके कारणों के बारे में शिक्षित करना चाहिए। ‘कुष्ठ रोग निवारण दिवस’ पर महात्मा गांधी द्वारा अपने जीवनकाल में कुष्ठ रोगियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के किए गए प्रयासों से सीख लेकर प्रत्येक नागरिक को कुष्ठ रोग, उसके उपचार, देखभाल और उसके रोगियों के पुनर्वास के बारे में जागृति फैलाने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। आज सबसे ज्यादा जरूरत कुष्ठ रोग पीड़ितों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की है। क्योंकि हमे रोग से लड़ना है रोगी से नहीं।

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