शिक्षा में सम्प्रभुता 

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जगदीश चौधरी

सुन्दर दिखना और सुन्दर होना दो अलग अलग बाते है। दैहिक सुन्दरता केवल पशु को शोभा देती है वही मनुष्य में मनो- दैहिक। वर्तमान परिपेक्ष्य शिक्षा का एक विकृत रूप प्रचलन में है जो हमे आवरण मात्र की सुन्दरता को सम्पूर्णता का आभास देता है और यही खालीपन दीक्षांत में शान्ति की बजाय अशांति, विनय की अपेक्षा अहंकार और सहजता के स्थान पर तनाव का कारण बनता है। आज की शिक्षा से सिर्फ अशांति, अहंकार और तनाव ही प्राप्त है। इन परिस्थितियों में भी जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था को साधे हुए है वो है भारतीय संस्कृति व संस्कार।आज भी भारतीय समाज में अनेको ऐसी वैज्ञानिक पद्धतियाँ आम जीवन शैली में है जो सहजता और आत्मविश्वास मनुष्य में बनाए रखते है। जिसमे हम विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को संतुलित बनाए रखता है। जीवन पद्धति, सामूहिक परिवार व्यवस्था , त्यौहार, सामाजिक संरचनाए इत्यादि मानवीय चेतना में इतना गहरा बैठी है कि वे मनुष्य को एक मजबूत आधार देती है और असहज क्षण में भी सहज बनाए रहती है।

वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति मूलतः परिस्थितियों का परिणाम है जिनमे शासक वर्ग शासित को मात्र सेवक के रूप में ही देखना चाहता था और समाज में निम्न और उच्च के वर्ग के आधार पर नई व्यवस्था की शुरुआत करना चाहता था। ऐसी व्यवस्था जब भारतीय अपने तथाकथित ब्रिटिश आकाओ के समकक्ष पहुंचने और उनकी नक़ल करने, उनके जैसा दिखकर ख़ुशी प्राप्त करे और अपने लोगो से ही घृणा करे। आज लगभग 185 वर्षों बाद जब ब्रिटिश भारतीयों को देखते होंगे तो इस शिक्षा व्यवस्था के फल और फूलो को इस प्रकार से भारतीय समाज में फलीभूत मन ही मन खुश होते होंगे। आज का तथाकथित शिक्षित वर्ग वही है भारतीयता, भारतीय रीति रिवाजो, परम्पराओ को अपमानित करे और सवयं को इनसे जितना दूर दिखाए उतना ज्यादा सम्मानित पाए। अपनी ही जड़ो को काटकर जीवित रहने की संकल्पना जिस प्रकार मिथ्या भर ही है, उसी प्रकार वर्तमान शिक्षा से सकारात्मक व्यवहार शिक्षा से सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन की भी अपेक्षा भी मिथ्या भर ही है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के मूल में ही गड़बड़ है।
शिक्षा वह है जो मनुष्य में स्थाई कल्याणकारी परिवर्तन करे। कल्याणकारी वह है जो सबके लिए शुभ हो। शुभ में शामिल है। इसमें किसी को अपमानित करना, नीचा दिखाना, बुराई करना, दूसरों को गिरा कर आगे बढ़ना किसी का नुकसान आदि का स्थान नहीं। जब कोई कार्य सामूहिक होता है और मनुष्य को उसकी योग्यता के अनुसार जिम्मेदारी मिलती है, तो सभी की अपेक्षा होती है कि वह सदस्य अपना काम ठीक से निभाएं। वह आत्मबल व जिम्मेदारी दोनों को बढ़ाने वाला है। यदि किसी भी कारणवश वह अ