18वें मुख्यमंत्री ने पद संभालते ही लिए लोक-लुभावन फैसले

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Bhopal/Atulya loktantra : कमलनाथ ने 18वें मुख्यमंत्री का पद संभालते ही किसानों की कर्जमाफी का वचन पूरा कर दिया है। कन्या-विवाह की सहायता राशि बढ़ाने और इसी तरह के कुछ अन्य लोक-लुभावन फैसले भी किए हैं। यह काम इतना आसान नहीं है लेेकिन उनकी पहल सकारात्मक है।

अब देखना यही है कि इसे जमीन पर कितनी जल्दी सही मायने में उतारा जाता है। त्वरित निर्णय लेने वाला मुख्यमंत्री अगर सही फैसले करे तो पांच साल का समय किसी भी प्रदेश की तस्वीर बदलने के लिए काफी है। कर्जमाफी ने जनता की अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं। लोग अब उम्मीद करेंगे कि कांग्रेस वचन-पत्र का हर वादा तय समय में पूरा करे।

अगर ऐसा होता है तो यह भारतीय राजनीति में एक अलग पहल होगी। लेकिन यह करने के लिए कमलनाथ को आने वाले समय में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। प्रदेश में ये चुनौतियां राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तीनों ही मोर्चों पर बनी हुई हैं। उनके पास समय बहुत कम है।

राहुल गांधी ने उन्हें इसी उम्मीद में सत्ता सौंपी है कि लोकसभा चुनाव में वो कांग्रेस को मध्यप्रदेश से कम से कम 20 सीटें दिलवाएंगे। अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होने हैं और शिवराज सरकार की लोक-लुभावनी छवि से मुकाबले के लिए उनके पास सिर्फ फरवरी तक का समय है। क्योंकि फरवरी में ही चुनाव आचार संहिता लग जाएगी। अगर हम इन चुनौतियों को सिलसिलेवार ढंग से देखें तो कुछ इस तरह का परिदृश्य है-

आर्थिक चुनौतियां : कर्जमाफी की फाइल साइन होने के साथ ही मध्यप्रदेश की जनता पर 34 से 38 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ आ जाएगा। जनता इस बोझ को महसूस न करे, इसके लिए उन्हें लोगों को रोजगार के अवसर देने होंगे।

जब तक वे यह अवसर नहीं दे पाती, तब तक बहुप्रतीक्षित बेरोजगारी भत्ते की उम्मीद लगाएंगे और यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि कांग्रेस इसे कितने समय में पूरा करेगी। हालांकि यह भत्ता उतना सरल नहीं है, जितना सरल लोग समझ रहे हैं। इसमें कई पेचीदगियां हैं और इसकी गणना से लेकर भुगतान तक कई किंतु-परंतु हैं।

शिवराज सरकार ने भावांतर और संबल जैसी योजनाएं शुरू की थीं, उन्हें इन योजनाओं का आकलन भी करना होगा। कर्जमाफी के बाद अगर ये योजनाएं जारी रहती हैं तो सरकार गहरे आर्थिक संकट में फंस सकती है। अगर योजनाएं बंद होती हैं तो कुशल राजनीतिक प्रबंधन से किसानों को समझाना होगा। किसानों को राहत देने के लिए बिजली बिल आधा करने का फैसला भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। हालांकि सरकार फिलहाल इसे लागू करेगी इसमें संदेह है। इसी तरह इंदिरा गृह ज्योति योजना के तहत सौ यूनिट बिजली सौ रुपए में देने का वचन भी है।

कर्जमाफी के बाद प्रदेश के आर्थिक हालात और चुनौतीपूर्ण बन गए हैं। अगले छह महीने में सरकार जो भी लोक-लुभावन घोषणाएं करेगी, उसका आधार कर्ज ही होगा। रिजर्व बैंक के नियमों के हिसाब से अभी सरकार के पास कर्ज लेने की पात्रता तो है, लेकिन हालात सुधारने के लिए स्थाई समाधान ढूंढऩा होगा।

प्रमोशन में आरक्षण का मसला सरकार के सामने लंबित है। नई सरकार को इसके नए नियम बनाने हैं और सभी वर्गों में सामंजस्य बैठाना है। संविदाकर्मियों और दैनिक वेतनभोगियों को नियमित करने का वादा भी काफी मुश्किल है। कर्मचारी इस बात पर दबाव बनाएंगे कि लोकसभा चुनाव से पहले यह वचन भी पूरा हो जाए।

मुख्य सचिव 31 दिसंबर को रिटायर हो रहे हैं और कमलनाथ के पास अच्छे विकल्प सीमित हैं। उन्हें सही फैसला करना होगा। इसी तरह वित्त के प्रमुख सचिव पर भी उन्हें निर्णय करना होगा। जिलों में तत्काल अच्छी टीम बनानी होगी, जिससे प्रशासनिक निर्णय आम जनता तक जल्दी पहुंच सकें। मप्र की ब्यूरोक्रेसी को लेकर जो एक अलग तरह की छवि बन गई है, उसे भी तोडऩा होगा।

राजनीतिक चुनौतियां – विधानसभा के नतीजों में भाजपा अभी 17 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस से आगे है। कांग्रेस की बढ़त सिर्फ 12 सीटों पर है। 29 लोकसभा क्षेत्रों में अगर कांग्रेस को अच्छा प्रदर्शन करना है तो कम से कम 20 सीटों पर आगे रहना होगा।

वोट के लिहाज से कांग्रेस के वोट (15595153) भाजपा के वोट(1564298) से 47817 कम हैं। कांग्रेस का वोट प्रतिशत 40.89 व भाजपा का 41.02 है। इसे कांग्रेस के पक्ष में बदलना होगा। राजनीतिक संतुलन बनाने में कमलनाथ बेजोड़ हैं, लेकिन उन्हें अपनी इस ताकत का इस्तेमाल पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गजों को संभालने में करना होगा। मंत्रिमंंडल के गठन में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देगा कि वे कैसे क्षेत्रीय और गुटों का संतुलन बनाते हैं।

सामाजिक चुनौतियां- आर्थिक आरक्षण का मुद्दा अपनी जगह कायम है। भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ा है। कमलनाथ सरकार अगर प्रमोशन में आरक्षण पर कोई फैसला लेती है तो यह विषय एक बार फिर सामने आ जाएगा। इस बार भाजपा भी आक्रामक रहने वाली है। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर प्रदेश की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यह पुलिस से ज्यादा सामाजिक समस्या है और इस पर ठोस काम की जरूरत है।

एससी-एसटी एक्ट में संशोधन से सवर्ण वर्ग नाराज है। चुनाव में भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ा है। इस मुद्दे को राजनीतिक सूझबूझ के साथ हल करना होगा। भाजपा के पास राम मंदिर मुद्दा है और इस चुनाव में कांग्रेस ने इसे बहुत ही समझदारी से अपने नियंत्रण में रखा है। आने वाले दिनों में भाजपा व संघ परिवार ज्यादा सक्रिय होगा तब भी ऐसी ही समझदारी दिखानी होगी।

ये वो चुनौतियां हैं : जिनका आने वाले समय में नई सरकार को सामना करना पड़ेगा। अभी कांग्रेस भाजपा से सीटों के गणित में आगे लेकिन वोटों के गणित में पीछे है। आने वाले समय में सबसे पहली परीक्षा लोकसभा चुनावों में होगी और तभी यह तय होगा कि किसानों की कर्जमाफी सिर्फ विधानसभा चुनाव का ही मुद्दा है या वाकई लोकसभा में भी यह भाजपा को बड़ी चुनौती देग

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