बदहाल स्कूली शिक्षा और निजी संस्थानों के हाल-हवाल

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ज्ञानेन्द्र रावत

आजकल देश में कोरोना और सीमा पर चीन की नापाक हरकत के साथ-साथ कोरोना के चलते मार्च महीने से बंद निजी स्कूलों के प्रबंधन द्वारा बच्चों की फीस वसूली की चर्चा भी जोरों पर है। कारण निजी स्कूलों का प्रबंधन बीते महीनों की फीस बसूली के लिए बच्चों के अभिभावकों पर दबाव डाल रहा है। फीस नहीं देने की स्थिति में स्कूल से बच्चों का नाम काटने की धमकी दे रहा है। इससे बच्चों के अभिभावक बेहद परेशान हैं।

कहीं वह जिलाधिकारियों, शिक्षाधिकारियों के समक्ष, तो कहीं धरना-प्रदर्शन कर और कहीं सरकार के नुमाइंदों के सामने अपनी समस्याएं रख बच्चों की फीस माफी की गुहार लगा रहे हैं। उनका कहना है कि कोरोना के चलते वैसे ही निजी प्रतिष्ठानों, कंपनियों द्वारा छंटनी किये जाने के कारण हजारों-लाखों अभिभावकों की नौकरी चली गई है। उस हालत में उनके सामने परिवार के पेट भरने की समस्या आ खड़ी हुई है। ऐसी स्थिति में बच्चों की बीते महीनों की हजारों की फीस कहां से भरें। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट ने भी अभिभावकों से कहा है कि वह सम्बंधित राज्यों के हाईकोर्ट में अपनी याचिका दाखिल करें क्योंकि हर राज्य की स्थिति भिन्न है।

विडम्बना देखिए कि इस बाबत कुछ को छोड़कर अधिकांश राज्य सरकारें मौन साधे बैठी हैं। हां राजस्थान की अशोक गहलौत सरकार ने अप्रैल में ही आदेश दे दिया था कि कोरोना काल में स्कूलों द्वारा स्कूल खुलने तक फीस न ली जाये। अब जब दोबारा 31 जुलाई तक के लिए स्कूलों को बंद कर दिया गया है, उस दशा में सरकार ने अपने 9 अप्रैल के फीस स्थगन आदेश को दोबारा स्कूल खुलने तक के लिए बढ़ा दिया है।

लेकिन उत्तर प्रदेश में जिलाधिकारियों के आदेश कि कोरोना वायरस के कारण इस आपदा अवधि में न स्कूल प्रबंधन द्वारा किसी अभिभावक को तीन माह की फी