स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और कोरोना का संकट

26
ज्ञानेन्द्र रावत

भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में अमेरिकी अर्थशास्त्री, जलवायु विशेषज्ञ और संयुक्त राष्ट्र् के महासचिव रहे कोफी अन्नान के विकास नीति सलाहकार जेफ्री सैश का मानना है कि भारत ने आजादी के बाद से ही स्वास्थ्य में बहुत कम निवेश किया है। राष्ट्रीय स्तर पर हो रही प्रतिक्रियायें और समाज के निचले स्तर से इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए भारत को न्यूनतम स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 50-60 डालर प्रति व्यक्ति की बेहद जरूरत है। जरूरत से कम निवेश एक पुरानी बीमारी है। यह ऐसी चीज है जिसे निश्चित रूप से अब 2020 से आगे नहीं जाना चाहिए। क्योंकि अब आपके पास सभी माध्यम हैं। ऐसे हालात में अधिक निवेश और कुशल प्रबंधन समय की मांग है। इसे नकारा नहीं जा सकता। दुख इस बात का है कि आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में दुनिया में भारत की रैंक्रिग 145 है।

आबादी, आकार, तकनीक और प्रचार के मामले में हम भले शीर्ष पर होने का दावा करते रहें, लेकिन स्वास्थ्य के मामले में हमारा रिकार्ड बहुत ही सोचनीय है। नतीजन लोगों को गुणवत्ता पूर्ण चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती। कोरोना महामारी के दौर में इस तथ्य को सबके सामने उजागर करके रख दिया है। वैश्विक स्तर पर देखें तो दुनिया में अभी तक कोरोना 77,4,299 से अधिक लोगों की जान ले चुका है। दुनिया के 188 देशों में कोरोना संक्रमित 21,901,102 से कहीं ज्यादा है। हमारे यहां 17 अगस्त तक इससे हुई मौतों का आंकड़ा 51 हजार 797 और संक्रमितों का 27,02,742 को पार कर चुका है। देश में संक्रमितों की रोजाना हो रही लगभग 60 हजार से अधिक की बढ़ोतरी गंभीर चिंता का विषय है। यह हालात की भयावहता का सबूत है। यही हाल रहा ता कुछ ही दिनों में कोरोना संक्रमितों के मामले में हमारा देश अमेरिका को भी पीछे छोड़ शीर्ष पर पहुंच जायेगा।
इस बारे में हार्बर्ड हैल्थ इंस्टीट्यूट के प्रख्यात चिकित्सक डा. आशीष दत्ता का कहना है कि कोरोना को लेकर भारतीय नीति समझ से परे है। पूर्ण लाॅकडाउन समाप्त होने के बाद के हालात सबूत हैं कि कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत कोरोना का ग्लोबल हाॅट स्पाॅट बनता जा रहा है। जरूरत यह है कि कोरोन